देहरादून (Uttarakhand News): उत्तराखंड की वादियां अब एक नए रंग और नई पहचान के साथ पर्यटकों को अपनी ओर खींचने वाली हैं. जिस तरह जापान में चेरी ब्लॉसम फेस्टिवल दुनिया भर के सैलानियों को अपनी ओर खींचता है, उसी तरह देवभूमि उत्तराखंड में भी अब ‘बुरांश महोत्सव’ और ‘पदम (हिमालयन चेरी) महोत्सव’ का आयोजन किया जाएगा. इस पहल से न केवल पहाड़ों की प्राकृतिक खूबसूरती को और निखारने का मौका मिलेगा बल्कि स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा.
कब और कैसे मनाए जाएंगे ये उत्सव
उत्तराखंड वन विभाग की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, बुरांश महोत्सव हर साल मार्च के दूसरे सप्ताह में मनाया जाएगा. यही वह समय है जब राज्य की पहाड़ियों पर लाल रंग के बुरांश के फूल (Uttarakhand Buransh Festival) पूरी तरह से खिल जाते हैं और पूरे एरिया को लाल चादर ओढ़ा देते हैं. वहीं, पदम यानी हिमालयन चेरी महोत्सव अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में आयोजित होगा. इस दौरान पहाड़ी इलाकों में पदम के पेड़ हल्के गुलाबी फूलों से लद जाते हैं और ऐसा नज़ारा पेश करते हैं जो किसी जादुई दुनिया से कम नहीं.
बुरांश और पदम की खासियत

- बुरांश (Rhododendron arboreum): यह न केवल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर भी है. बुरांश का जूस पारंपरिक रूप से पाचन संबंधी समस्याओं के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है.
- पदम या हिमालयन चेरी (Prunus cerasoides): यह साल में दो बार खिलता है, मार्च-अप्रैल और अक्टूबर में. जब यह फूल पूरी तरह से खिल जाते हैं तो पेड़ गुलाबी रंग के बादल जैसे दिखाई देते हैं. इन दोनों फूलों का पारिस्थितिकी तंत्र में भी अहम योगदान है. इनके खिलने से कई पक्षी, मधुमक्खियां और परागण करने वाले जीव इन पर निर्भर रहते हैं.
महोत्सव में क्या-क्या होगा खास?
वन विभाग ने इन महोत्सवों के दौरान कई तरह की रोचक गतिविधियां रखने की योजना बनाई है. जैसे- फूलों से भरी घाटियों और ट्रेल्स तक ट्रेकिंग कार्यक्रम, स्थानीय लोगों (Eco tourism in Uttarakhand) की भागीदारी के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, बुरांश और पदम से बने (Uttarakhand forest department festivals) उत्पादों की प्रदर्शनी, फूलों पर निर्भर पक्षियों और परागण करने वाले जीवों की स्पॉटिंग और सर्वेक्षण. इस तरह यह महोत्सव सिर्फ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं होगा, बल्कि स्थानीय परंपराओं और लोककथाओं को संजोने का एक अवसर भी बनेगा.

क्या है इसके पीछे का मकसद
इस पहल का मुख्य मकसद इन फूलों के सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व को उजागर करना है. साथ ही, स्थानीय समुदाय और स्कूलों को इसमें जोड़कर संरक्षण और सतत इस्तेमाल की दिशा में काम करना भी है. जब लोग इन फूलों और उनसे जुड़ी परंपराओं के बारे में जानेंगे, तो इनके संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे.
जापान और कोरिया से प्रेरणा
दुनिया में फूलों के उत्सवों की परंपरा पुरानी है. जापान में ‘हनामी’ नाम से चेरी ब्लॉसम देखने (Flower festivals in Uttarakhand) की संस्कृति सदियों पुरानी है, जहां लोग परिवार और दोस्तों के साथ चेरी के पेड़ों के नीचे पिकनिक मनाते हैं. इसी तरह दक्षिण कोरिया का जिन्हे गुनहांग्जे फेस्टिवल भी लाखों पर्यटकों को खींचता है. उत्तराखंड में होने वाले बुरांश और पदम महोत्सव भी आने वाले समय में उसी तरह पहचान बना सकते हैं.
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