देहरादून का परेड ग्राउंड शुक्रवार को फिर से गरमा गया। कारण वही-उपनल कर्मचारियों का लंबे समय से चला आ रहा आंदोलन, लेकिन इस बार हवा में एक नया विवाद शामिल हो गया। उत्तराखंड बेरोज़गार संघ ने बैकडोर नियुक्तियों और नियमितीकरण के विरोध में (UPNL VS Berojgar Sangh) सीधे मोर्चा खोला तो पूरे मामले में एक नया तनाव पैदा हो गया। अब यह लड़ाई सिर्फ उपनल कर्मचारियों और सरकार के बीच नहीं रह गई, बल्कि बेरोज़गार युवाओं बनाम आउटसोर्सिंग व्यवस्था का बड़ा मुद्दा बन गई है।

लगभग 22 हजार उपनल कर्मचारी बीते 12 दिनों से लगातार परेड ग्राउंड में धरना दे रहे हैं। कर्मचारियों की मुख्य मांगें हैं—
1. नियमितीकरण
2. समान वेतन
3. सेवा सुरक्षा और भविष्य की भर्ती व्यवस्था में साफ-सुथरी नीति
सरकार ने तीन दफा बातचीत की कोशिश की, लेकिन अभी तक कोई निर्णय नहीं निकल सका है। इसी बीच बेरोज़गार संघ के बयान ने विरोध का नया मोर्चा खोल दिया है।

बेरोज़गार संघ का आरोप-उपनल बैकडोर भर्ती का सबसे बड़ा रास्ता
प्रेस वार्ता में बेरोज़गार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने तीखे शब्दों में कहा कि प्रदेश में आउटसोर्सिंग के नाम पर लगातार बैकडोर नियुक्तियां हो रही हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उपनल, पीआरडी और अन्य एजेंसियों के माध्यम से विभागों में होने वाली भर्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य (2006) निर्णय में स्पष्ट कहा गया है कि अनियमित या बैकडोर नियुक्तियों का नियमितीकरण कानून के खिलाफ है।
इसके बावजूद उत्तराखंड सरकार इन नियुक्तियों को अनदेखा कर रही है, जो बेरोज़गार युवाओं के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

कंडवाल ने यह भी आरोप लगाया कि उपनल का उद्देश्य भूतपूर्व सैनिकों का पुनर्वास था, लेकिन आज यह नेताओं और प्रभावशाली लोगों के लिए अपनों को नौकरी देने का माध्यम बन चुका है। उनका कहना कि अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी करती रही, तो बेरोज़गार संघ अदालत में याचिका दायर करेगा।

उपनल कर्मचारियों ने कहा- बेरोज़गार संघ की मुद्दा भटकाने की चाल
बेरोज़गार संघ के बयान के बाद उपनल कर्मचारियों की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि बेरोज़गार संघ कर्मचारियों की संघर्षशील आवाज को कमजोर करने के लिए गलत जानकारी फैला रहा है। उपनल कर्मचारी संयुक्त मोर्चा के अध्यक्ष विनोद गोदियाल ने कहा कि वे किसी “बैकडोर भर्ती” का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्षों से जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोग हैं। उनकी सेवा शर्तें बेहद अस्थिर हैं और उन्हें नियमित करने की मांग पूरी तरह न्यायसंगत है। अगर बेरोज़गार संघ को आपत्ति है, तो उसे सीधे कोर्ट में जाकर अपना पक्ष रखना चाहिए। कई कर्मचारी नेताओं ने कहा कि उनकी लड़ाई नियमित वेतन और स्थायी सेवा संरचना के लिए है, न कि किसी के अवसर छीनने के लिए।
सुरेश सिंह ने रखे चार बड़े बिंदु, सरकार से तुरंत नीति बनाने की मांग
बेरोज़गार संघ के उपाध्यक्ष सुरेश सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चार बड़ी मांगें रखीं।
- उपनल, पीआरडी और सभी आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से होने वाली बैकडोर नियुक्तियां तत्काल रोकी जाएं।
- सभी रिक्त पदों पर सीधी भर्ती UKPSC/UKSSSC जैसी वैधानिक संस्थाओं से ही कराई जाए।
- उमा देवी फैसला (2006) अक्षरशः लागू किया जाए और स्पष्ट शासनादेश जारी हो।
- नियमितीकरण प्रस्तावों की समीक्षा कर उन्हें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुरूप बनाया जाए।
सुरेश सिंह ने कहा कि यह मुद्दा लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा है और सरकार का दायित्व है कि वह पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करे।

सरकार दबाव में, कमेटी कर रही है समाधान खोजने की कोशिश
राज्य सरकार ने उपनल कर्मचारियों की मांगों पर विचार के लिए एक कमेटी बनायी है।
कमेटी सेवा सुधार, नियमितीकरण और आउटसोर्सिंग नीति पर विकल्प तलाश रही है। लेकिन बेरोज़गार संघ के विरोध ने इस प्रक्रिया को और पेचीदा बना दिया है।
प्रदेश में रोजगार मॉडल पर बड़ा सवाल उठ खड़ा
यह पूरा विवाद केवल उपनल तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश की रोजगार व्यवस्था, पारदर्शिता, और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार किस दिशा में कदम बढ़ाती है। उपनल कर्मचारियों के पक्ष में या बेरोज़गार संघ की मांगों के अनुरूप पूरी व्यवस्था बदलने की ओर। फिलहाल परेड ग्राउंड में विरोध जारी है और यह मुद्दा आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति और भर्ती व्यवस्था दोनों की लिटमस टेस्ट बन गया है।




