देहरादून (Dehradun News): जब-जब पहाड़ों पर आपदा कहर बरपाती है, सबसे ज़्यादा मुश्किलें आम लोगों के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने में आती हैं. उत्तराखंड में इस बार की आपदा ने फुलेत और छमरौली जैसे (disaster relief) गांवों को अलग-थलग कर दिया. 12 किलोमीटर पैदल सफर कर जब जिलाधिकारी (डीएम) सविन बंसल खुद इन गांवों तक पहुँचे थे, तो ग्रामीणों ने साफ कहा था कि सितंबर महीने का खाद्यान्न अब तक नहीं मिला. उसी समय डीएम ने वादा किया था कि मुख्यालय पहुंचते ही राशन आपके गांव तक पहुंचाया जाएगा और अब उस वादे को ज़मीनी हकीकत में बदलकर दिखाया गया है.

क्यों ज़रूरी थी हवाई मदद?
फुलेत और छमरौली गाव आपदा के बाद सड़क संपर्क से कटे रहे. करीब 1500 की आबादी वाले इन दोनों गाँxवों तक राशन पहुंचाना बड़ी चुनौती थी. बरसात और पहाड़ों की मुश्किल भौगोलिक स्थिति के कारण ट्रक या जीप से पहुंच पाना लगभग नामुमकिन था. ऐसे में जिलाधिकारी ने मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी से (DM Savin Bansal news) विशेष अनुमति ली कि हेलीकॉप्टर से खाद्यान्न पहुंचाया जाए. मुख्यमंत्री ने भी साफ निर्देश दिए कि प्रभावितों को राहत कार्य युद्धस्तर पर पूरा किया जाए.

सुबह-सुबह पहुंचा राशन
मुख्यालय लौटते ही डीएम ने आदेश जारी किए और रविवार सुबह-सुबह ही राहत अभियान शुरू हो गया. अपर सिटी मजिस्ट्रेट अपूर्वा सिंह की अगुवाई में हेलीकॉप्टर से खाद्यान्न गांव तक भेजा गया. ग्राउंड जीरो पर स्पेशल तहसीलदार चमन सिंह पहले से मौजूद थे. उन्होंने गांव वालों को राशन प्राप्त कर वितरण का काम संभाला.

वादे की मिसाल
अक्सर ग्रामीण इलाकों में लोग ये शिकायत करते हैं कि अधिकारी सिर्फ आश्वासन देकर चले जाते हैं. लेकिन इस बार मामला अलग था. डीएम सविन बंसल ने 12 किलोमीटर पैदल चलकर ग्रामीणों से मुलाकात की, हाल सुने और वादा किया और अब उसी वादे को निभाते हुए हेलीकॉप्टर से खाद्यान्न भेजा गया. ग्रामीणों के लिए यह राहत की बड़ी खबर है कि सितंबर महीने का राशन अब उनके घरों तक पहुंच गया है.
इस पूरी कार्रवाई ने एक बात साफ कर दी, जब सिस्टम गंभीरता से काम करे तो राहत पहुंचाना नामुमकिन नहीं है. हेलीकॉप्टर से राशन पहुंचाना सिर्फ एक मदद नहीं, बल्कि भरोसे (Uttarakhand helicopter relief operation) की मिसाल है कि संकट की घड़ी में सरकार और प्रशासन आपके साथ खड़ा है. फुलेत और छमरौली के लोगों के लिए ये सिर्फ राशन का सवाल नहीं था, बल्कि यह उम्मीद का पैगाम भी है और जिलाधिकारी सविन बंसल ने यह दिखा दिया कि प्रशासन अगर ठान ले, तो पहाड़ की सबसे कठिन राह भी आसान हो सकती है.
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